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Hindi


Episodes
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Shri Jagannath Chalisa श्री जगन्नाथ चालीसा

7/9/2024
Shri Jagannath Chalisa श्री जगन्नाथ चालीसा ★ ॥ दोहा ॥ श्री जगन्नाथ जगत गुरू, आस भगत के आप। नाम लेते ही आपका, मिटे कष्ट संताप ।। मैं अधम हूँ मूढ़ मति, पूजा विधि का ना ज्ञान । दोष मेरा ना धरना नाथ, मैं हूँ तेरी संतान ।। ।। चौपाई।। जय जगन्नाथ जगत के पालक, भव भय भंजन कष्ट निवारक । संगी साथी ना जिसका कोई, आसरा उसका बस एक तू ही ।। भगतों के दुख दूर करे तु, संतों के सदा मन में बसे तू । पतित पावन नाम तिहारा, सारे जग में तू इक प्यारा ।। शंख क्षेत्र में धाम है तेरा, पीड़ हरे है नाम तिहारा । सागर तट में नीलगिरी पर, तूने बसा लिया अपना घर ।। जो तेरे रूप को मन में बसाये, चिन्ता जगकी ना उसे सताये । तेरी शरण में जो भी आये, विपदा से तू उसे बचाये ।। धाम तेरा हर धाम से न्यारा, जिसके बिना है तीर्थ अधूरा । ना हो जब तक तेरे दर्शन, निष्फल जीवन और तीर्थाटन ।। हाथ पैर नहीं है प्रभु तेरा, फिर भी सभी को तेरा ही आसरा । नाथ जगत का तू कहलाता, हर कोई तेरी महिमा गाता ।। भगतों को तू सदा लुभाता, महिमा अपनी उनसे गँवाता । दासी या भगत था एक अनोखा, रूप तेरा साग भात में देखा ।। अपने बगीचे से श्रीफल तोड़ा, दे ब्राह्मण को हाथ वो जोड़ा। जा रहे प्रभु का करने दर्शन, श्रीफल ये कर देना अर्पण ।। अनहोनी ऐसी हुई भाई, प्रभु ने बाँहे अपनी बढ़ाई। हाथ से विप्र के ले नारियल, दासिया को दिया भक्ति का फल ।। बंधु महंती की भक्ति कहें क्या, प्रभु को मित्र सा प्यारा वो था । दर्श का आस तेरे ले मन में, आया तेरे पुनीत नगर में ।। संग में लाया कुटुंब था अपना, पहुँचा तुझ तक जब हुई रैना । सिंह द्वार मंदिर का बंद था, भूखे पेट बंधु सोया था ।। भगत का कष्ट ना सह पाये भगवन, स्वर्ण थाल में लाये भोजन । साल वेग पूत मुगल पिता का नाम तेरा हर पल लेता था ।। रथ यात्रा में आ पाये न पुरी, सैकड़ों कोस की थी जो दूरी। गुहार लगाई जगन्नाथ को, आँऊ न जब तक रोकना रथ को ।। सारा जग तब चकित हुआ था, भक्त की इच्छा जब पूर्ण हुई थी। डूबे जग देव भक्ति में तेरे, गीत गोविंद रचा नाम में तेरे ।। लिखते लिखते कवि ठहर गये, रचना पूर्ण कौन कर पाये। पत्नि से कहा स्नान कर आँऊ, आकर फिर से बुद्धि लगाँऊ ।। रूप कवि का धरा प्रभु ने, गीत अधूरा किया पूर्ण प्रभू ने । प्रेम से भक्त के प्रभु बंधे हैं, भक्ति प्रीति के डोर से जुड़े हैं।। बिना मोल के प्यार से बिकता, कर्मा बाई की खिचड़ी खाता । जात पात का भेद न कोई, जो तुझे देखा सुध बिसराई ।। शंकर देव निराकार उपासक, देख तुझे बने तेरे स्थापक । श्री गुरुनानक संत कबीरा, हर कोई तुझको एक सा प्यारा ।। तुम सा प्रभु कोई और कहाँ है, भक्त जहाँ है तू भी वहाँ है। भक्तों के मन को हरषाने, रथ पर आता दर्शन देने । पाकर प्यारे प्रभु का दर्शन, कर लो धन्य सभी यह जीवन ।। जय जगन्नाथ प्रेम से बोलो, अमृत नाम का कहे कुंदन पी लो। ।। दोहा ।। कृष्ण बलराम दोनों ओर बीच सुभद्रा बहन । नीलंचल वासी जगन्नाथ सदा बसो मोरे मन ।।

Duration:00:08:40

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Jagannath Rathyatra Mantra जगन्नाथ रथयात्रा मन्त्र ଶ୍ରୀ ଜଗନ୍ନାଥ ରଥ ଯାତ୍ରା ମନ୍ତ୍ର

7/5/2024
Jagannath Rathyatra Mantra जगन्नाथ रथयात्रा मन्त्र ★ नीलाचलनिवासाय नित्याय परमात्मने बलभद्रसुभद्राभ्यां जगन्नाथाय ते नमः । जगदानन्दकन्दाय प्रणतार्तहराय च । नीलाचलनिवासाय जगन्नाथाय ते नमः ।। ★

Duration:00:01:12

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Sri Jagannath Prarthana | श्री जगन्नाथ प्रार्थना | ଶ୍ରୀ ଜଗନ୍ନାଥ ପ୍ରାର୍

7/5/2024
Sri Jagannath Prarthana श्री जगन्नाथ प्रार्थना ★ रथयात्रा के दौरान 10 दिनों तक जो भी भक्त अपने दुखों से मुक्ति पाने एवं मनवाछिंत कामना की पूर्ति के लिए भगवान जगन्नाथ की इस स्तुति का पाठ करते हैं श्री जगन्नाथ जी उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं। श्री जगन्नाथ स्तोत्र का पाठ विधि 1- सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण, श्री बलराम जी एवं देवी सुभद्रा जी पंचोपचार पूजन- जल, अक्षत-पुष्प, धुप, दीप और नैवेद्य से पूजन करने के बाद हाथ जोड़कर प्रभु का ध्यान करें। 2- पूजन के बाद स्त्रोत के पहले दो श्लोक से योगेश्वर श्री कृष्ण, श्री बलराम, और देवी सुभद्रा को दण्वत प्रणाम करें। 3- पूजन और नमन करने के बाद किसी धुले हुए आसन पर बैठकर भगवान श्री जगन्नाथ जी की इस प्रार्थना का शांत चित्त होकर धीमे स्वर में पाठ करें । • ।। श्री जगन्नाथ प्रार्थना ।। रत्नाकरस्तव गृहं गृहिणी च पद्मा, किं देयमस्ति भवते पुरुषोत्तमाय। अभीर, वामनयनाहृतमानसाय, दत्तं मनो यदुपते त्वरितं गृहाण।।१।। भक्तानामभयप्रदो यदि भवेत् किन्तद्विचित्रं प्रभो कीटोऽपि स्वजनस्य रक्षणविधावेकान्तमुद्वेजितः। ये युष्मच्चरणारविन्दविमुखा स्वप्नेऽपिनालोचका: तेषामुद्धरण-क्षमो यदि भवेत्कारुण्य सिन्धुस्तदा।।२।। अनाथस्य जगन्नाथ नाथस्त्वं मे न संशयः, यस्य नाथो जगन्नाथस्तस्य दुःखं कथं प्रभो।। या त्वरा द्रौपदीत्राणे या त्वरा गजमोक्षणे, मय्यार्ते करुणामूर्ते सा त्वरा क्व गता हरे।।३।। मत्समो पातकी नास्ति त्वत्समो नास्ति पापहा । इति विज्ञाय देवेश यथायोग्यं तथा कुरु।।४।। •

Duration:00:02:43

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Shri Jagannath Stotra | श्री जगन्नाथ स्तोत्र | ଜଗନ୍ନାଥ ଷ୍ଟୋଟ୍ରା

7/5/2024
Shri Jagannath Stotra श्री जगन्नाथ स्तोत्र ★ जो भी भक्त अपने दुखों से मुक्ति पाने एवं मनवाछिंत कामना की पूर्ति के लिए भगवान जगन्नाथ के इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, श्री जगन्नाथ जी उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी कर देते हैं। श्री जगन्नाथ स्तोत्र का पाठ विधि सबसे पहले भगवान श्री कृष्ण, श्री बलराम जी एवं देवी सुभद्रा जी पंचोपचार पूजन- जल, अक्षत-पुष्प, धुप, दीप और नैवेद्य से पूजन करने के बाद हाथ जोड़कर प्रभु का ध्यान करें। इसके बाद किसी धुले हुए आसन पर बैठकर भगवान श्री जगन्नाथ जी के इस स्त्रोत का शांत चित्त होकर धीमे स्वर में पाठ करें । 4- जब तक पाठ चलता रहे तब तक गाय के घी का दीपक भी जलता रहे। 5- ऐसा कहा जाता कि इस स्त्रोत का सिर्फ एक बार पाठ करने से मानसिक शांति मिलने के साथ अनेक कष्टों का निवारण श्री भगवान जी कर देते हैं।

Duration:00:24:55

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Shri Jagannath Ashtakam | श्री जगन्नाथ अष्टकम् | ଶ୍ରୀ ଜଗନ୍ନାଥ ଅଷ୍ଟକମ୍

7/5/2024
Shri Jagannath Ashtakam श्री जगन्नाथ अष्टकम् ◆ कदाचित् कालिन्दी तट विपिन सङ्गीत तरलो। मुदाभीरी नारी वदन कमला स्वाद मधुपः।। रमा शम्भु ब्रह्मामरपति गणेशार्चित पदो। जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥१॥ भुजे सव्ये वेणुं शिरसि शिखिपिच्छं कटितटे दुकूलं नेत्रान्ते सहचर-कटाक्षं विदधते । सदा श्रीमद्‍-वृन्दावन-वसति-लीला-परिचयो। जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥२॥ महाम्भोधेस्तीरे कनक रुचिरे नील शिखरे वसन् प्रासादान्तः सहज बलभद्रेण बलिना । सुभद्रा मध्यस्थः सकलसुर सेवावसरदो। जगन्नाथः स्वामी नयन-पथ-गामी भवतु मे ॥३॥ कृपा पारावारः सजल जलद श्रेणिरुचिरो रमा वाणी रामः स्फुरद् अमल पङ्केरुहमुखः । सुरेन्द्रैर् आराध्यः श्रुतिगण शिखा गीत चरितो। जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥४॥ रथारूढो गच्छन् पथि मिलित भूदेव पटलैः स्तुति प्रादुर्भावम् प्रतिपदमुपाकर्ण्य सदयः । दया सिन्धुर्बन्धुः सकल जगतां सिन्धु सुतया । जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥५॥ परंब्रह्मापीड़ः कुवलय-दलोत्‍फुल्ल-नयनो निवासी नीलाद्रौ निहित-चरणोऽनन्त-शिरसि । रसानन्दी राधा-सरस-वपुरालिङ्गन-सुखो । जगन्नाथः स्वामी नयन-पथगामी भवतु मे ॥६॥ न वै याचे राज्यं न च कनक माणिक्य विभवं न याचेऽहं रम्यां सकल जन काम्यां वरवधूम् । सदा काले काले प्रमथ पतिना गीतचरितो । जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥७॥ हर त्वं संसारं द्रुततरम् असारं सुरपते हर त्वं पापानां विततिम् अपरां यादवपते । अहो दीनेऽनाथे निहित चरणो निश्चितमिदं । जगन्नाथः स्वामी नयन पथ गामी भवतु मे ॥८॥ जगन्नाथाष्टकं पुन्यं यः पठेत् प्रयतः शुचिः । सर्वपाप विशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ॥९॥ ॥ इति श्रीमत् शंकराचार्यविरचितं जगन्नाथाष्टकं संपूर्णम् ॥

Duration:00:06:07

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Jamdagni Krit Shiv Stotram जमदग्नि कृत शिव स्तोत्रम्

7/3/2024
Jamdagni Krit Shiv Stotram जमदग्नि कृत शिवस्तोत्रं • ईश त्वां स्तोतुमिच्छामि सर्वथा सतोतुमक्षमम् I अक्षराक्षरबीजं च किं वा स्तौमि निरीहकम् II १ II न योजनां कर्तुमीशो देवेशं स्तौमि मूढधीः I वेदा न शक्ता यं स्तोतुं कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः II २ II बुद्धेर्वाग्मनसोः पारं सारात्सारं परात्परम् I ज्ञानबुर्द्धेरसाध्यं च सिद्धं सिद्धैर्निषेवितम् II ३ II यमाकाशमिवाद्यन्तमध्यहीनं तथाव्ययम् I विश्वतन्त्रमतन्त्रं च स्वतन्त्रं तन्त्रबीजकम् II ४ II ध्यानासाध्यं दुराराध्यमतिसाध्यं कृपानिधिम् I त्राहि मां करुणासिन्धो दीनबन्धोSतिदीनकम् II ५ II अद्य मे सफ़लं जन्म जीवितं च सुजीवितम् I स्वप्रादृष्टं च भक्तानां पश्यामि चक्षुषाधुना II ६ II शक्रादयः सुरगणाः कलया यस्य सम्भवाः I चराचराः कलांशेन तं नमामि महेश्वरम् II ७ II यं भास्करस्वरूपं च शशिरूपं हुताशनम् I जलरूपं वायुरूपं तं नमामि महेश्वरम् II ८ II स्त्रीरूपं क्लीबरूपं च पुंरूपं च बिभर्ति यः I सर्वाधारं सर्वरूपं तं नमामि महेश्वरम् II ९ II देव्या कठोरतपसा यो लब्धो गिरिकन्यया I दुर्लभस्तपसां यो हि तं नमामि महेश्वरम् II १० II सर्वेषां कल्पवृक्षं च वाञ्छाधिकफ़लप्रदम् I आशुतोषं भक्तबन्धुं तं नमामि महेश्वरम् II ११ II अनन्तविश्वसृष्टीनां संहर्तारं भयकरम् I क्षणेन लीलामात्रेण तं नमामि महेश्वरम् II १२ II यः कालः कालकालश्च कालबीजं च कालजः I अजः प्रजश्च यः सर्वस्तं नमामि महेश्वरम् II १३ II इत्यवमुक्त्वा स भृगुः पपात चरणाम्बुजे I आशिषं च ददौ तस्मै सुप्रसन्नो बभूव सः II १४ II जामदग्न्यकृतं स्तोत्रं यः पठेद् भक्तिसंयुतः I सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं स गच्छति II १५ II • II इति श्री ब्रह्मवैवर्तपुराणे गणपतिखण्डे जामदग्न्यकृतं श्रीशिवस्तोत्रं संपूर्णं II

Duration:00:06:13

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Punya Vardhak Mantra पुण्य वर्धक मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं नमः 108 times

7/3/2024
Punya Vardhak Mantra पुण्य वर्धक मंत्र : ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं नमः 108 times ◆ (ये मंत्र पहले आपके पाप कर्मों को "नष्ट" करेगा और "पुण्य" को बढ़ाएगा, फिर "समृद्धि" लाएगा। ना किसी के चक्कर काटना, ना धन का खर्च और मन की शांति खोना। जप से मन में "विश्वास तुरंत आता है और “फालतू" विचारों को "ताला" लग जाता है. बाधाएं आये ही नहीं, इसके लिए भक्ति और विश्वास से उपरोक्त मंत्र की १ माला तीर्थंकरों अथवा इष्टदेव की किसी भी मूर्ति/फोटो/तस्वीर के आगे रोज जाप करें। (घर पर हो तो दीपक और अगरबत्ती करें -इससे अधिष्ठायक देव प्रसन्न होते हैं).

Duration:00:11:23

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Padmavati Kavacham पद्मावती कवचम्

7/3/2024
Padmavati Kavacham पद्मावती कवचम् ★ भगवन् ! सर्वमाख्यातं, मंत्रं यंत्रं शुभप्रदम् । पदमायाः कवचं ब्रूहि, यद्यहं तव वल्लभा ।।1।। महागोप्यं महागुह्यं पद्मायाः सर्वकामदम् । कवचं मोहनं देवि ! गुरुभक्ताय दीयते 11211 राज्यं देयं च सर्वस्वं कवचं न प्रकाशयेत् । गुरुभक्ताय दातव्यमन्यथा सिद्धिदं नहि ||3|| ऐं बीजं, क्लीं शक्तिः हसौ कीलकम् पद्मावती - प्रीत्यर्थं जपे विनियोगः । ॐ पद्माबीजं शिरः पातु, ललाट पंचमी परा । नेत्रे कामप्रदा पातु मुखं भुवनसुन्दरी ।।4।। नाभिकां नागनाथश्च जिह्वां वागीश्वरी तथा । श्रुतिरूपा जगद्धात्री, करौ हृतं हिमवासिनी 11511 उदरं मोहदमनी, कुण्डली नाभिमण्डलम् । पार्श्व पृष्टं कटि गुह्य शक्ति स्थान निवासिनी 11611 उरुजुंघे तथा पादौ सर्वविघ्नविनाशिनी । रक्ष रक्ष महामाये ! पद्म । पद्मालये ! शिवे ! 117।। वांच्छितं पूरयत्वाशु पद्मा सा पातुः सर्वतः । इदं तु कवचं देव्या यो जानाति च मंत्रवित 11811 राजद्वारे श्मशाने च भूतप्रेतोपचारिके । बन्धने च महादुःखे भये शत्रुसमागमे ||9|| स्मरणात्कवचस्यास्य भयं किंचिन्न जायते । प्रयोगमुपचारं च पद्मायाः कर्त्तुमिच्छति ।।10।। कवचं प्रपठेदादौ ततः सिद्धिमवापुयात् । भूर्जे पत्रे लिखित्वा तु कवचं यस्तु धारयेत् ।।11।। देहे च यत्रकुत्राऽपि सर्वसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम् । शस्त्राग्निजं भयं नैव, भूतादिभयनाशनम् ।।12।। गुरुभक्तिं समासाद्य पद्मायाः स्तवनं कुरु । सहस्रनामपठने कवचं प्रथमं कुरु 111311 नन्दिना कथितं देवि तवाग्रे तत् प्रकाशितम् सांगता जायते देवि । नान्यथा गिरिनन्दिनी ।।14।। ! इदं कवचमज्ञात्वा पद्मायाः स्तौति यो नरः । कल्पकोटिशतेनाऽपि न भवेत सिद्धिदायिनी ।।15।। || इति श्री रुद्रयामले पद्मावतीकवचं सम्पूर्णम् ।

Duration:00:35:14

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Before Meals Mantra भोजन पूर्व मंत्र

6/26/2024
Before Meals Mantra भोजन पूर्व मंत्र ★ Before Meals Mantra भोजन पूर्व मन्त्र ★ ॐ सह नाववतु, सह नौ भुनक्तु, सह वीर्यं करवावहै तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकर प्राण वल्लभे । ज्ञान वैराग्य सिद्धयर्थम् भिक्षाम् देहि च पार्वति।। ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् | ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना ।। ★ अर्थात् परमेश्वर हम शिष्य और आचार्य दोनों की साथ-साथ रक्षा करें, हम दोनों को साथ-साथ विद्या के फल का भोग कराए, हम दोनों एकसाथ मिलकर विद्या प्राप्ति का सामर्थ्य प्राप्त करें, हम दोनों का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो, हम दोनों परस्पर द्वेष न करें। माँ अन्नपूर्णा शिव की शक्ति हैं, शिव जी का जीवन संगिनी है, वे संपूर्ण है। अनादिकाल से अन्नपूर्णा जुड़ाव को अन्न का वरदान दे रहा है और अनंत तक वे अन्न का प्रसाद प्रदान करते रहेंगे। हम भी माँ अन्नपूर्णा से हमारे ज्ञान और वैराग्य के इस मार्ग में सिद्धि प्राप्त करने हेतु आवश्यक अन्न रूपी प्रसाद के भिक्षा की याचना करते हैं व माँ हमें अन्न की भिक्षा प्रदान करें। (जिस यज्ञ में) अर्पण ब्रह्म है, हवन-द्रव्य भी ब्रह्म है, तथा ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा ब्रह्मरूप अग्नि में आहुति देने की क्रिया भी ब्रह्मरुप है- उस ब्रह्मकर्मरुप समाधि द्वारा प्राप्त किये जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही है ।

Duration:00:00:54

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De Addiction Mantra व्यसन मुक्ति मन्त्र 11 times

6/20/2024
De Addiction Mantra व्यसन मुक्ति मन्त्र ★ दुर्व्यसनों से बचने के लिए यह मंत्र राम बाण उपाय है। ■ ॐ ह्रीं यं यश्वराये नमः ■ इस मंत्र के जाप से बड़ी ही आसानी से शराब, तम्बाकू और अन्य नशों की लत छूट जाती है और आपका मन अच्छे कामों के लिए केंद्रित होता है।

Duration:00:01:43

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Saubhagya Mantra सौभाग्य मन्त्र ॐ ह्रीं नमः 108 times

6/20/2024
Chanting of ■ ॐ ह्रीं नमः ■ 108 times for 40 days at night time brings you out of troubles

Duration:00:07:50

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Ashwath (Peepal) Stotram अश्वत्थ (पीपल) स्तोत्रम्

6/19/2024
Ashwath Stotram अश्वत्थ स्तोत्रम् ★ नारद उवाच अनायासेन लोकोऽयम् सर्वान् कामानवाप्नुयात् । सर्वदेवात्मकं चैकं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १॥ ब्रह्मोवाच श्रुणु देव मुनेऽश्वत्थं शुद्धं सर्वात्मकं तरुम् । यत्प्रदक्षिणतो लोकः सर्वान् कामान् समश्नुते ॥ २॥ अश्वत्थाद्दक्षिणे रुद्रः पश्चिमे विष्णुरास्थितः । ब्रह्मा चोत्तरदेशस्थः पूर्वेत्विन्द्रादिदेवताः ॥ ३॥ स्कन्धोपस्कन्धपत्रेषु गोविप्रमुनयस्तथा । मूलं वेदाः पयो यज्ञाः संस्थिता मुनिपुङ्गव ॥ ४॥ पूर्वादिदिक्षु संयाता नदीनदसरोऽब्धयः । तस्मात् सर्वप्रयत्नेन ह्यश्वत्थं संश्रयेद्बुधः ॥ ५॥ त्वं क्षीर्यफलकश्चैव शीतलस्य वनस्पते । त्वामाराध्य नरो विन्द्यादैहिकामुष्मिकं फलम् ॥ ६॥ चलद्दलाय वृक्षाय सर्वदाश्रितविष्णवे । बोधिसत्वाय देवाय ह्यश्वत्थाय नमो नमः ॥ ७॥ अश्वत्थ यस्मात् त्वयि वृक्षराज नारायणस्तिष्ठति सर्वकाले । अथः श्रुतस्त्वं सततं तरूणां धन्योऽसि चारिष्टविनाशकोऽसि ॥ ८॥ क्षीरदस्त्वं च येनेह येन श्रीस्त्वां निषेवते । सत्येन तेन वृक्षेन्द्र मामपि श्रीर्निषेवताम् ॥ ९॥ एकादशात्मरुद्रोऽसि वसुनाथशिरोमणिः । नारायणोऽसि देवानां वृक्षराजोऽसि पिप्पल ॥ १०॥ अग्निगर्भः शमीगर्भो देवगर्भः प्रजापतिः । हिरण्यगर्भो भूगर्भो यज्ञगर्भो नमोऽस्तु ते ॥ ११॥ आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च । ब्रह्म प्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते ॥ १२॥ सततं वरुणो रक्षेत् त्वामाराद्दृष्टिराश्रयेत् । परितस्त्वां निषेवन्तां तृणानि सुखमस्तु ते ॥ १३॥ अक्षिस्पन्दं भुजस्पन्दं दुःस्वप्नं दुर्विचिन्तनम् । शत्रूणां च समुत्थानं ह्यश्वत्थ शमय प्रभो ॥ १४॥ अश्वत्थाय वरेण्याय सर्वैश्वर्य प्रदायिने । नमो दुःस्वप्ननाशाय सुस्वप्नफलदायिने ॥ १५॥ मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णु रूपिणे । अग्रतः शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नमः ॥ १६॥ यं दृष्ट्वा मुच्यते रोगैः स्पृष्ट्वा पापैः प्रमुच्यते । यदाश्रयाच्चिरञ्जीवी तमश्वत्थं नमाम्यहम् ॥ १७॥ अश्वत्थ सुमहाभाग सुभग प्रियदर्शन । इष्टकामांश्च मे देहि शत्रुभ्यस्तु पराभवम् ॥ १८॥ आयुः प्रजां धनं धान्यं सौभाग्यं सर्वसम्पदम् । देहि देव महावृक्ष त्वामहं शरणं गतः ॥ १९॥ ऋग्यजुःसाममन्त्रात्मा सर्वरूपी परात्परः । अश्वत्थो वेदमूलोऽसावृषिभिः प्रोच्यते सदा ॥ २०॥ ब्रह्महा गुरुहा चैव दरिद्रो व्याधिपीडितः । आवृत्य लक्षसङ्ख्यं तत् स्तोत्रमेतत् सुखी भवेत् ॥ २१॥ ब्रह्मचारी हविष्याशी त्वदःशायी जितेन्द्रियः । पपोपहतचित्तोऽपि व्रतमेतत् समाचरेत् ॥ २२॥ एकाहस्तं द्विहस्तं वा कुर्याद्गोमयलेपनम् । अर्चेत् पुरुषसूक्तेन प्रणवेन विशेषतः ॥ २३॥ मौनी प्रदक्षिणं कुर्यात् प्रागुक्तफलभाग्भवेत् । विष्णोर्नामसहस्रेण ह्यच्युतस्यापि कीर्तनात् ॥ २४॥ पदे पदान्तरं गत्वा करचेष्टाविवर्जितः । वाचा स्तोत्रं मनो ध्याने चतुरङ्गं प्रदक्षिणम् ॥ २५॥ अश्वत्थः स्थापितो येन तत्कुलं स्थापितं ततः । धनायुषां समृद्धिस्तु नरकात् तारयेत् पितृन् ॥ २६॥ अश्वत्थमूलमाश्रित्य शाकान्नोदकदानतः । एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिब्राह्मणभोजनम् ॥ २७॥ अश्वत्थमूलमाश्रित्य जपहोमसुरार्चनात् । अक्षयं फलमाप्नोति ब्रह्मणो वचनं यथा ॥ २८॥ एवमाश्वासितोऽश्वत्थः सदाश्वासाय कल्पते । यज्ञार्थं छेदितेऽश्वत्थे ह्यक्षयं स्वर्गमाप्नुयात् ॥ २९॥ छिन्नो येन वृथाऽश्वत्थश्छेदिता पितृदेवताः । अश्वत्थः पूजितो यत्र पूजिताः सर्वदेवताः ॥ ३०॥ ॥ इति अश्वत्थ स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

Duration:00:09:19

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Reverse Chanting of Namokar Mantra णमोकार मन्त्र की पश्चानुपूर्वी (उल्टी) जाप 9 times

6/18/2024
Pashchanupurvi (Reverse) Chanting of Namokar Mantra णमोकार मन्त्र की पश्चानुपूर्वी (उल्टी) जाप ◆ णमो लोए सव्वसाहूणं णमो उवज्झायाणं णमो आईरियाणं णमो सिद्धाणं णमो अरिहन्ताणं ◆

Duration:00:05:53

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Haygreeva Stotram | हयग्रीव स्तोत्रम् | హయగ్రీవ స్తోత్రం | ஹயக்ரீவ ஸ்தோத்திரம்

6/9/2024
Haygreeva Stotram | हयग्रीव स्तोत्रम् | హయగ్రీవ స్తోత్రం | ஹயக்ரீவ ஸ்தோத்திரம் ◆ ज्ञानानन्दमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिं आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे ॥1॥ स्वतस्सिद्धं शुद्धस्फटिकमणिभू भृत्प्रतिभटं सुधासध्रीचीभि र्द्युतिभिर वदातत्रिभुवनं अनन्तैस्त्रय्यन्तैरनुविहित हेषाहलहलं हताशेषावद्यं हयवदनमीडेमहिमहः ॥2॥ समाहारस्साम्नां प्रतिपदमृचां धाम यजुषां लयः प्रत्यूहानां लहरिविततिर्बोधजलधेः कथादर्पक्षुभ्यत् कथककुलकोलाहलभवं हरत्वन्तर्ध्वान्तं हयवदनहेषाहलहलः ॥3॥ प्राची सन्ध्या काचिदन्तर्निशायाः प्रज्ञादृष्टे रञ्जनश्रीरपूर्वा वक्त्री वेदान् भातु मे वाजिवक्त्रा वागीशाख्या वासुदेवस्य मूर्तिः ॥4॥ विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपं विज्ञानविश्राणनबद्धदीक्षं दयानिधिं देहभृतां शरण्यं देवं हयग्रीवमहं प्रपद्ये ॥5॥ अपौरुषेयैरपि वाक्प्रपञ्चैः अद्यापि ते भूतिमदृष्टपारां स्तुवन्नहं मुग्ध इति त्वयैव कारुण्यतो नाथ कटाक्षणीयः ॥6॥ दाक्षिण्यरम्या गिरिशस्य मूर्तिः- देवी सरोजासनधर्मपत्नी व्यासादयोऽपि व्यपदेश्यवाचः स्फुरन्ति सर्वे तव शक्तिलेशैः ॥7॥ मन्दोऽभविष्यन्नियतं विरिञ्चः वाचां निधेर्वाञ्छितभागधेयः दैत्यापनीतान् दययैन भूयोऽपि अध्यापयिष्यो निगमान्नचेत्त्वम् ॥8॥ वितर्कडोलां व्यवधूय सत्त्वे बृहस्पतिं वर्तयसे यतस्त्वं तेनैव देव त्रिदेशेश्वराणा अस्पृष्ट डोलायितमाधिराज्यम् ॥9॥ अग्नौ समिद्धार्चिषि सप्ततन्तोः आतस्थिवान्मन्त्रमयं शरीरं अखण्डसारैर्हविषां प्रदानैः आप्यायनं व्योमसदां विधत्से ॥10॥ यन्मूल मीदृक्प्रतिभातत्त्वं या मूलमाम्नाय महाद्रुमाणां तत्त्वेन जानन्ति विशुद्धसत्त्वाः त्वामक्षरामक्षरमातृकां त्वां ॥11॥ अव्याकृताद्व्याकृतवानसि त्वं नामानि रूपाणि च यानि पूर्वं शंसन्ति तेषां चरमां प्रतिष्ठां वागीश्वर त्वां त्वदुपज्ञवाचः ॥12॥ मुग्धेन्दुनिष्यन्दविलोभनीयां मूर्तिं तवानन्दसुधाप्रसूतिं विपश्चितश्चेतसि भावयन्ते वेलामुदारामिव दुग्ध सिन्धोः ॥13॥ मनोगतं पश्यति यस्सदा त्वां मनीषिणां मानसराजहंसं स्वयम्पुरोभावविवादभाजः किङ्कुर्वते तस्य गिरो यथार्हम् ॥14॥ अपि क्षणार्धं कलयन्ति ये त्वां आप्लावयन्तं विशदैर्मयूखैः वाचां प्रवाहैरनिवारितैस्ते मन्दाकिनीं मन्दयितुं क्षमन्ते ॥15॥ स्वामिन्भवद्द्यान सुधाभिषेकात् वहन्ति धन्याः पुलकानुबन्दं अलक्षिते क्वापि निरूढ मूलं अङ्ग्वेष्वि वानन्दथुमङ्कुरन्तम् ॥16॥ स्वामिन्प्रतीचा हृदयेन धन्याः त्वद्ध्यानचन्द्रोदयवर्धमानं अमान्तमानन्दपयोधिमन्तः पयोभि रक्ष्णां परिवाहयन्ति ॥17॥ स्वैरानुभावास् त्वदधीनभावाः समृद्धवीर्यास्त्वदनुग्रहेण विपश्चितोनाथ तरन्ति मायां वैहारिकीं मोहनपिञ्छिकां ते ॥18॥ प्राङ्निर्मितानां तपसां विपाकाः प्रत्यग्रनिश्श्रेयससम्पदो मे समेधिषीरं स्तव पादपद्मे सङ्कल्पचिन्तामणयः प्रणामाः ॥19॥ विलुप्तमूर्धन्य लिपिक्रमाणा सुरेन्द्रचूडापदलालितानां त्वदङ्घ्रि राजीवरजःकणानां भूयान्प्रसादो मयि नाथ भूयात् ॥20॥ परिस्फुरन्नूपुर चित्रभानु – प्रकाशनिर्धूततमोनुषङ्गा पदद्वयीं ते परिचिन्महेऽन्तः प्रबोधराजीव विभातसन्ध्याम् ॥21॥ त्वत्किङ्करालङ्करणोचितानां त्वयैव कल्पान्तरपालितानां मञ्जुप्रणादं मणिनूपुरं ते मञ्जूषिकां वेदगिरां प्रतीमः ॥22॥ सञ्चिन्तयामि प्रतिभादशास्थान् सन्धुक्षयन्तं समयप्रदीपान् विज्ञानकल्पद्रुम पल्लवाभं व्याख्यानमुद्रामधुरं करं ते ॥23॥ चित्ते करोमि स्फुरिताक्षमालं सव्येतरं नाथ करं त्वदीयं ज्ञानामृतोदञ्चनलम्पटानां लीलाघटीयन्त्रमिवाऽऽश्रितानाम् ॥24॥ प्रबोधसिन्धोररुणैः प्रकाशैः प्रवालसङ्घातमिवोद्वहन्तं विभावये देव स पुस्तकं ते वामं करं दक्षिणमाश्रितानाम् ॥25॥ तमां सिभित्त्वाविशदैर्मयूखैः सम्प्रीणयन्तं विदुषश्चकोरान् निशामये त्वां नवपुण्डरीके शरद्घनेचन्द्रमिव स्फुरन्तम् ॥26॥ दिशन्तु मे देव सदा त्वदीयाः दयातरङ्गानुचराः कटाक्षाः श्रोत्रेषु पुंसाममृतङ्क्षरन्तीं सरस्वतीं संश्रितकामधेनुम् ॥27॥ विशेषवित्पारिषदेषु नाथ विदग्धगोष्ठी समराङ्गणेषु जिगीषतो मे कवितार्किकेन्द्रान् जिह्वाग्र सिंहासनमभ्युपेयाः ॥28॥ त्वां चिन्तयन् त्वन्मयतां प्रपन्नः त्वामुद्गृणन् शब्दमयेन धाम्ना स्वामिन्समाजेषु समेधिषीय स्वच्छन्द वादाहवबद्धशूरः ॥29॥ नानाविधानामगतिः कलानां न चापि तीर्थेषु कृतावतारः ध्रुवं तवाऽनाध परिग्रहायाः नव नवं पात्रमहं दयायाः ॥30॥ अकम्पनीयान्यपनीतिभेदैः अलङ्कृषीरन् हृदयं मदीयम् शङ्का कलङ्का पगमोज्ज्वलानि तत्त्वानि सम्यञ्चि तव प्रसादात् ॥31॥ व्याख्यामुद्रां करसरसिजैः पुस्तकं शङ्खचक्रे भिभ्रद्भिन्न स्फटिकरुचिरे पुण्डरीके निषण्णः । अम्लान श्रीरमृतविशदैरंशुभिः प्लावयन्मां आविर्भूयादनघमहिमामानसे वागधीशः ॥32॥ वागर्थसिद्धिहेतोःपठत हयग्रीवसंस्तुतिं भक्त्या कवितार्किककेसरिणा वेङ्कटनाथेन विरचितामेताम् ॥33॥ ◆

Duration:00:14:39

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Jin Pratima Prakshaal Vidhi Paath जिन प्रतिमा प्रक्षाल विधि पाठ

6/8/2024
Jin Pratima Prakshaal Vidhi Paath जिन प्रतिमा प्रक्षाल विधि पाठ

Duration:00:15:54

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Vaakambhrini Suktam वाकम्भृणी सूक्तम्

6/5/2024
Vaakambharni Suktam वाकम्भरणी सूक्तम् ★ यह सूक्त ऋग्वेद के मंडल १० के सूक्त १२५ में लिखा गया है, इसे कहीं-कहीं वाकम्भरणी सूक्त भी कहा गया है, ऋग्वेदोक्तं देवी सूक्तम् - ★ विनियोगः - ॐ अहमित्यष्टर्चस्य सूक्तस्य वागाम्भृणी ऋषिः, सच्चित्सुखात्मकः सर्वगतः परमात्मा देवता, द्वितीयाया ऋचो जगती, शिष्टानां त्रिष्टुप् छन्दः, देविमाहात्म्यपाठे विनियोगः ★ ध्यानम् ॐ सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिर्भुजैः शङ्खं चक्रधनुःशराम्च् दधती नेत्रैस्त्रिभिः शोभिता, आमुक्ताङ्ग्द हारकङ्क्ण रणत्कान्ची रणन्नूपूरा दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु नो रत्नोल्लसत्कुण्डला. ★ देवीसूक्तम् - ॐ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः। अहं मित्रावरुणोभा विभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्विनोभा ।।1।। अहं सोममाहनसं विभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्। अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते ।।2।। अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् तां मा देवा व्यदधुः पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूर्य्यावेशयन्तीम् ।।3।। मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति यः प्राणिति य ईं शृणोत् युक्तम् । अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि।।4।। अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः । यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम् ।।5।। अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ । अहं जनाय समदं क्रिणोम्यहं द्यावापृथिवी आ विवेश ।।6।। अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे । ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां वर्ष्मणोप स्पृशामि ।।7।। अहमेव वात इव प्रवाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा । परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव ।।8।। ★ ॥ इति श्री ऋग्वेदोक्तं देवी सूक्तं संपूर्णम् ।। ★

Duration:00:04:20

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Sri Kumari Stotram | श्री कुमारी स्तोत्रम् | ஸ்ரீ குமாரி ஸ்தோத்திரம் | ശ്രീ കുമാരി സ്തോത്രം

6/4/2024
Sri Kumari Stotram श्री कुमारी स्तोत्रम् ★ जगत्पूज्ये जगद्वन्द्ये सर्वशक्तिस्वरूपिणि । पूजां गृहाण कौमारि जगन्मातर्नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥ त्रिपुरां त्रिगुणाधारां त्रिवर्गज्ञानरूपिणीम् । त्रैलोक्यवन्दितां देवीं त्रिमूर्ति पूजयाम्यहम् ॥२॥ कलात्मिकां कलातीतां कारुण्यहृदयां शिवाम् कल्याणजननीं देवीं कल्याणीं पूजयाम्यहम् ॥३॥ अणिमादिगुणाधरामकाराद्यक्षरात्मिकाम् । अनन्तशक्तिकां लक्ष्मीं रोहिणीं पूजयाम्यहम् ॥४॥ कामचारीं शुभां कान्तां कालचक्रस्वरूपिणीम् । कामदां करुणोदारां कालिकां पूजयाम्यहम् ॥५॥ चण्डवीरां चण्डमायां चण्डमुण्डप्रभञ्जिनीम् । पूजयामि सदा देवीं चण्डिकां चण्डविक्रमाम् ॥६॥ सदानन्दकरीं शान्तां सर्वदेवनमस्कृताम् । सर्वभूतात्मिकां लक्ष्मीं शाम्भवीं पूजयाम्यहम् ॥७॥ दुर्गमे दुस्तरे कार्ये भवदुःखविनाशिनीम् । पूजयामि सदा भक्त्या दुर्गां दुर्गार्तिनाशिनीम् ॥८ ॥ सुन्दरीं स्वर्णवर्णाभां सुखसौभाग्यदायिनीम्। सुभद्रजननीं देवीं सुभद्रां पूजयाम्यहम् ॥९॥ इति श्री कुमारी स्तोत्रम् ।

Duration:00:04:01

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Vasudev Krit Shri Krishna Stotra वसुदेव कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र

6/4/2024
Vasudev Krit Shri Krishna Stotra वसुदेव कृत श्रीकृष्ण स्तोत्र • श्रीमन्तमिन्द्रियातीतमक्षरं निर्गुणं विभुम् । ध्यानासाध्यं च सर्वेषां परमात्मानमीश्र्वरम् ॥ १ ॥ स्वेच्छामयं सर्वरुपं स्वेच्छारुपधरं परम् । निर्लिप्तं परमं ब्रह्म बीजरुपं सनातनम् ॥ २ ॥ स्थूलात् स्थूलतरं व्याप्तमतिसूक्ष्ममदर्शनम् । स्थितं सर्वशरीरेषु साक्षिरूपमदृश्यकम् ॥ ३ ॥ शरीरवन्तं सगुणमशरीरं गुणोत्करम् । प्रकृतिं प्रकृतीशं च प्राकृतं प्रकृतेः परम् ॥ ४ ॥ सर्वेशं सर्वरूपं च सर्वान्तकरमव्ययम् । सर्वाधारं निराधारं निर्व्यूहं स्तौमि किं विभो ॥ ५ ॥ अनन्तः स्तवनेsशक्तोsशक्ता देवी सरस्वती । यं स्तोतुमसमर्थश्र्च पञ्चवक्त्रः षडाननः ॥ ६ ॥ चतुर्मुखो वेदकर्ता यं स्तोतुमक्षमः सदा । गणेशो न समर्थश्र्च योगीन्द्राणां गुरोर्गुरुः ॥ ७ ॥ ऋषयो देवताश्र्चैव मुनीन्द्रमनुमानवाः । स्वप्ने तेषामदृश्यं च त्वामेवं किं स्तुवन्ति ते ॥ ८ ॥ श्रुतयः स्तवनेsशक्ताः किं स्तुवन्ति विपश्र्चितः । विहायैवं शरीरं च बालो भवितुमर्हसि ॥ ९ ॥ वसुदेवकृतं स्तोत्रं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः । भक्तिदास्यमवाप्नोति श्रीकृष्णचरणाम्बुजे ॥ १० ॥ विशिष्टपुत्रं लभते हरिदासं गुणान्वितम् । सङकटं निस्तरेत् तूर्णं शत्रुभीत्या प्रमुच्यते ॥ ११ ॥ • ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तपुराणे श्रीकृष्णजन्मखण्डे वसुदेवकृतं श्रीकृष्णस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

Duration:00:04:27

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Tulsidas Krit Shri Ram Stuti तुलसीदास कृत श्रीराम स्तुति

6/4/2024
Tulsidas Krit Shri Ram Stuti तुलसीदास कृत श्रीराम स्तुति ★ ॥दोहा॥ श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन हरण भवभय दारुणं । नव कंज लोचन कंज मुख कर कंज पद कंजारुणं ॥१॥ कन्दर्प अगणित अमित छवि नव नील नीरद सुन्दरं । पटपीत मानहुँ तडित रुचि शुचि नोमि जनक सुतावरं ॥२॥ भजु दीनबन्धु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दनं । रघुनन्द आनन्द कन्द कोशल चन्द दशरथ नन्दनं ॥३॥ शिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अङ्ग विभूषणं । आजानु भुज शर चाप धर संग्राम जित खरदूषणं ॥४॥ इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनं । मम् हृदय कंज निवास कुरु कामादि खलदल गंजनं ॥५॥ मन जाहि राच्यो मिलहि सो वर सहज सुन्दर सांवरो । करुणा निधान सुजान शील स्नेह जानत रावरो ॥६॥ एहि भांति गौरी असीस सुन सिय सहित हिय हरषित अली। तुलसी भवानिहि पूजी पुनि-पुनि मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥ ॥सोरठा॥ जानी गौरी अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि । मंजुल मंगल मूल वाम अङ्ग फरकन लगे। रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास

Duration:00:03:15

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Manorath Siddhi Jain Mantra मनोरथ सिद्धि जैन मन्त्र

6/3/2024
Manorath Siddhi Jain Mantra मनोरथ सिद्धि जैन मन्त्र ★ ॐ हीं श्रीं ह्रीं क्लीं अ सि आ उ सा चुलु चुलु हुलु हुलु मुलु मुलु कुलु कुलु इच्छियं मे कुरु कुरु स्वाहा। ★

Duration:00:28:17